यूँ ना मुझे तुम भुलाओ, संभल जाओ

वर्तमान  में अंग्रेजी भाषा ने पूर्ण रूप से हमारे देश में अपना प्रभाव जमा लिया है।  आज यह विदेशी भाषा हमारे जेहन में पूरी तरह छा  चुकी है।  आपको किसी भी क्षेत्र में अपने आपको स्थापित  करना हो तो आपको अंग्रेजी का ज्ञान होना  लगभग अनिवार्य सा बन चुका  है।

क्यों हम अपनी संस्कृति , परम्परा ,भाषाइत्यादि को छोड़कर दूसरों की भाषा का  , संस्कृति का अनुकरण कर रहे हैं । जबकि  हमारी अपनी भाषा हिंदी , संस्कृत तमिल तेलगु इत्यादि हैं तो क्यों हम उनको भूलते जा रहें हैं।  समय की इस तेज रफ़्तार से कदम मिलाने की आपाधापी में , हम यह भूल गए हैं की जब अपनी भाषा और संस्कृति का हास होता है तो इसकी गूंज सदियों तक सुनाई देती है  आने वाली पीढ़ियों में स्पष्ट नजर आती है। जो क्षति आपने की है उसका प्रत्यक्ष दर्शन  करना जरुरी नहीं, हम समय रहते  भी चेत सकते हैं।  अपने इतिहास में झांक के दखेंगे तो  बहुत कुछ स्पष्ट हो जायेगा। ये जो आप बार  बार  बोलते हो संस्कार नहीं हैं उसका एक कारण  अपनी ही भाषा की अवहेलना करना है क्यूंकि भाषा संस्कृति और संस्कार ये एक दूसरे के पूरक हैं। आपको अंग्रेजी भाषा में वो आनंद  आएगा ही  नहीं जो हिंदी में आएगा। और हमने तो बुजर्गो से एकहवत सुनी है जो की एकदम सत्य है

 “संस्कृत महारानी ,हिंदी बहुरानी,अंग्रेजी नौकरानी”

अब आप स्वयं में विचार करो की, हम समय के साथ कदमताल करने के प्रयास में कंही इतनी ज्यादा आगे तो नहीं  निकल आये की अपनी जड़ों को ही  छोड़ आये जो हमे सींचती रही हैं।

अपने बच्चों का अंग्रजी का ज्ञान अवश्य दो , पर मातृभाषा को कभी न भुलाओ ,उनका भविष्य स्वतः ही एक उज्जवल मार्ग की और बढ़ेगा।  चाहे वक़्त कितना भी  बदल जाए, परन्तु हमें अपनी भाषा , अपनी संस्कृति अपने बच्चों को विरासत में देनी है , उसे संजो कर रखना है। याद रखें  हम हिन्द के वासी हैं इंग्लिश्तान के नहीं।

अपनी भाषा को लुप्त ना होने दे , इसे संजो कर रखे और इसका प्रचार प्रसार करें।  इसका मान सम्मान और प्रतिष्ठा को विश्व स्तर पर स्थापित करने का निरंतर प्रयास करते रहें।

  भाषा राष्ट्र की पहचान होती है
उसके बाशिंदो की शान होती हैं
अपनी ही भाषा बढ़ाएगी मान हमारा

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