कब तक अपने हाथों से अपनी कब्र खोदेंगे :भरतपुर के किसान और मृत्युभोज

 मृत्युभोज (कार्ज) एक ऐसा अभिशाप है जिसे हम वर्षों से ढोते  आ रहे हैं शहरों में तो ये लगभग ख़त्म हो चूका है लेकिन ग्रामीण क्षेत्र जहाँ  बुनियादी सुविधाओं का अभाव है , किसानों की फसल केवल कर्ज ही चुकाने में चली जाती है नफा तो मुश्किल से ले पाते हैं, जमीनें किसान क्रेडिट कार्ड के लिए रहन (गिरवी) पर रखी हुई हैं , सहकारी समिति से भी कर्ज लेना पड़ ही जाता है.  जाने कब पक के तैयार खडी फसल को बारिश , ओले बर्बाद कर दें कुछ पता नही. बच्चों की फीस हमेशा बैसाख में ही भर पाती है , अच्छे  स्कूलों में बच्चों का पढ़ने का मन तो बहुत करता है पर जेब इजाजत नही देती. डॉक्टर के पास चक्कर बीमारी के गंभीर होने पर ही लग पाता है,  नही तो झोला छापों से ही काम चला  लेते हैं. कपड़े खरीदना त्यौहार की तरह होता है इसलिए केवल  त्योहारों या घर में शादी होने पर खरीदें जाते हैं

                                          इन सब तथ्यों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि  किसान कितनी विषम परिस्तिथियों में अपना परिवार का भरण पोषण करता  है. किसान अपनी जेब से पैसा केवल तभी निकालता है जब वो अतिआवश्यक हो जाये अन्यथा  उसके पास इतना पैसा नही होता कि वो किसी भी प्रकार का अनावश्यक  खर्च उठा सके,  ना उसकी आदत होती कि वो जरुरत से ज्यादा खर्च करे.      

           

यही  किसान जो चारों तरफ से आर्थिक तंगी से दिन रात संघर्ष कर रहा है. एक दुअन्नी भी अनावश्यक खर्च नही करता अपनी इच्छाओं को मारकर परिवार का भरण पोषण करता है. वही किसान अगर लाखों रूपये मृत्युभोज पर सिर्फ इसलिए उड़ा देता  है ताकि समाज में उसका नाक नीची ना हो तो जानकर बहुत दुःख होता है, और ये लाखों रूपये वो अपनी बचत से नही खर्च करता , बेचारे किसान के पास इतना बचता  ही कहाँ है. वो  ये पैसा किसी व्यापारी या बड़े बड़े किसानों या किसी नौकरीपेशा से उधार लेता है दो रुपया  सैकड़ा की ब्याज पर मतलब 24%, वो भी इस मंहगाई के दौर में जहाँ बड़े बड़े उद्योग भी 16 -20% ब्याज पर कर्ज लेते हैं. मतलब  समय के मारे किसान किसी भी बड़ी इंडस्ट्री से ज्यादा ब्याज चुकाते हैं , सिर्फ अपनी नाक नीची होने से बचाने के लिए क्या हमारी नाक सच में इतनी महंगी ब्याज के काबिल है.

 

अब बात करते हैं हमारे किसान समाज की , किसी भी प्रगतिशील समाज के नियम उसकी तरक्की की बात करते हैं. अब हम किसान अपनी बेटियों का भी पढ़ा रहे हैं वो घर से बाहर भी निकल रही हैं और नौकरियां भी कर रही और हम सब सहर्ष इस बदलाव को लाये हैं फिर हमारा समाज खासकर कि भरतपुर का किसान समाज इस बात के लिए क्यूँ पहल नही करता. राजस्थान के झुंझुनू ,सीकर और भी दुसरे जिलों में सभी जातीय पंचायतों ने इस पर रोक लगा दी है. तो भरतपुर के प्रबुद्ध किसान नेताओं को भी इसकी पहल करनी चाहिये वो बहुत पीछे चल रहे हैं, इसे जल्द से जल्द किया जाना चाहिये ताकि हमारी महंगी नाकों का सवाल ही ख़त्म हो जाये जब समाज इसे प्रतिबंधित कर देगा तो नाक का सवाल अपने से ख़त्म हो जायेगा.

 

कुछ दिनों पहले मैंने अपने  गाँव और रिश्तेदारी में कुछ हमारे भाई बन्धु किसानो से बातचीत  की. उस बातचीत में पता चला कि लगभग हर किसान इस प्रथा से दुखी है, लेकिन फिर भी ये प्रथा जारी है. जो लोग म्रत्युभोज करा चुके हैं और नुक्सान उठा चुके हैं  वो नही चाहते कि कोई दूसरा इससे कन्नी काट के निकल ले क्यूंकि जब में गड्ढे में गिरा हूँ तो तुम्हे भी कर्ज के इस दलदल में गिराऊंगा. कुछ बड़े किसान इसे जबरदस्ती इज्जत का सवाल बनाते हैं ताकि लोग उनके पास उधार करने आते रहे हों और वो घर बैठे ब्याज कमाए.  कोई अगर नही मानेगा  तो इतने ताने मारेंगे  कि उसे  मजबूरन मृत्युभोज करना ही पड़ेगा. हम सब अन्दर से ऐसे ही हैं.

हमे सोचना चाहिये कि इस तानाकसी से नुकसान तो हमारा ही है हम ताने मारना बंद कर देंगे   तो ये प्रथा स्वतः नष्ट हो जाएगी. इन तानो से फायदा है उन सूदखोरों को जिन्हें मोटी ब्याज मिलती है . अब ये हम किसानों को तय करना है कि हमे इस म्रत्युभोज और ब्याज के कुचक्र से निकलना है या इसी में फंसे रहना है.

 

BrijTimes की  सभी प्रबुद्ध जनों से अपील है कृपया इस विषय पर अपने गाँव में समाज में चर्चा करें इसका रोका जाना बहुत जरुरी है. आप चर्चा तो शुरू करिये बहुत लोग आपके साथ आ जायेंगे वो बस किसी के बोलने का इंतज़ार कर रहे है.

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